Mere Pati Ko Meri Khuli Chunoti- Part-4

By | December 3, 2018
Mere Pati Ko Meri Khuli Chunoti- Part-4

Mere Pati Ko Meri Khuli Chunoti- Part-4

Mere Pati Ko Meri Khuli Chunoti – Episode 3

शाम को मनीष मेरा इंतजार कर रहा था।

उसने मिलते ही पूछा, “ दीक्षा आप मुझे क्या सजा देना चाहते हो?”

तब मैंने कहा, “तुम्हें मुझे कॉफी पिलानी पड़ेगी।”

हम रास्ते में कॉफी हाउस में बैठे तब उसने कहा की वह अगले बारह दिन तक नहीं मिलेगा। वह अपने गाँव जा रहा था। वह बीबी को मिलने जा रहा था और खुश था।

मेरे दिमाग में पता नहीं क्या बात आयी की मैंने उसका हाथ पकड़ कर पूछा, “मनीष तुम अपनी बीबी से मिलकर मुझे भूल तो नहीं जाओगे?”

बड़ा अजीब सा सवाल था। मेरे सवाल का मनीष कुछ भी मतलब निकाल सकता था। शायद वह मेरी सबसे बड़ी गलती थी। मैंने सीधे सीधे अपनी तुलना उसकी बीबी के साथ कर दी थी।

वह मेरी और ताकता रहा। शायद उसे मेरे अकेलेपन का एहसास हो रहा था। उसने मेरा हाथ पकड़ कर दबाया और बोला, “देखो प्रिया, बीबी तो ज्यादा से ज्यादा दस दिन का साथ देगी। पर तुम तो मेरी रोज की साथीदार हो। मैं तुम्हें कैसे भूल सकता हूँ? कई बार पराये अपनों से ज्यादा अपने हो जाते हैं। जो दुःख में साथ दे और दुःख दूर करने की कोशिश करे वह अपना है…

अभी तो हमारी दोस्ती की शुरुआत है। और उतनी देर में पराये होते हुए भी तुमसे मुझे शकुन मिला है। आगे चलकर यदि हम एक दूसरे से मिलकर एक दूसरे का दुःख बाँटते हैं और एक दूसरे का दुःख दूर करने की कोशिश करते हैं तो फिर तुम्हें भूलने का तो सवाल ही नहीं। सवाल यह नहीं की बीबी से मिलकर मैं तुम्हें भूल जाऊँगा। सवाल यह है की कहीं तुम्हें मिल कर मैं बीबी को ना भूल जाऊं।”

मनीष ने कुछ भी ना कहते हुए सब कुछ कह दिया। बात बात में उसने इशारा किया की मैंने उसे उस दिन ट्रैन में उसका माल निकाल कर उसको बहुत शकुन दिया था। अब आगे चल कर हम दोनों को एक दूसरे का दुःख दूर करना चाहिए।

उसका दुःख क्या था? उसको चोदने के लिए एक औरत की चूत चाहिए थी। और मेरा दर्द क्या था? मेरी चूत को एक मर्द का मोटा लंबा लण्ड चाहिए था।

उसने इशारा किया की हमारी चुदाई ही हमारा दुःख दूर कर सकती थी। उसकी आवाज में मुझे आने वाले कल की रणकार सुनाई दी। मुझे उसकी आवाज में कुछ दर्द भी महसूस हुआ। उस सुबह पुरे मेट्रो के एक घंटे के सफर में मैंने मनीष का हाथ नहीं छोड़ा और ना ही उसने।

जब तक मनीष था तो सुबह मेट्रो में जाते समय घर से निकलते ही पता नहीं क्यों, मुझमें अजीब सी ऊर्जा आती थी और मेरे पॉंव मनीष को मिलने की आश में दौड़ने लगते थे। मनीष के जाने से वह ऊर्जा गायब हो गयी।

अब मेरे पति के बिना मेरी रातें और मनीष के बिना मेरी सुबह सुनी हो गयी। ऑफिस में दिन तो गुजर जाता था पर घरमें वापस आने के बाद अकेलेपन में रात गुजारना मेरे लिए बहुत ही मुश्किल था।

पति के बाहर रहने से मुझे जातीय कामना की असंतुष्टि और अँधेरे के डर के मारे बड़ी बेचैनी हो रही थी। पर मैं उसे बड़ी हिम्मत से झेल रही थी।

कुछ दिनों के बाद पति से फोन पर बात करना भी मुश्किल हो गया। मैं जब भी फ़ोन करती, मेरे पति यह कह कर जल्दी में फ़ोन काट देते की वह मीटिंग में हैं। मेरी समझ में यह नहीं आ रहा था की इतनी रात गए कौनसी मीटिंग चल रही होगी? पहले तो कभी ऐसा नहीं होता था।

मुझे शक होने लगा की हो ना हो मेरे पति का शायद कोई औरत से चक्कर चल रहा था। मेरे पति को मैं भली भाँती जानती थी। मेरे पति जैसा वीर्यवान परुष औरत की चूत के बिना इतने दिन रह सके यह बात मुझे हजम होने वाली नहीं थी। यह बात ख़ास कर उनके हेड ऑफिस बेंगलोर में होती थी।

मेरा यह वहम तब पक्का हुआ जब एक रात मैंने फ़ोन मिलाया और उन्होंने कहा की वह मीटिंग में है; तो पीछे से किसी औरत की जोर से ठहाके मार कर हंसने की आवाज आयी और मैंने उस औरत बोलते हुए साफ़ साफ़ सूना की “झूठे कहीं के। अपनी बीबी को बेवकूफ बना रहे हो? तुम मीटिंग में हो या मैटिंग में?” (मैटिंग का मतलब होता है मर्द और औरत का चोदना) मेरे पति ने आगे मुझसे बात किये बिना ही तुरंत फ़ोन काट दिया।

उस रात के बाद कुछ दिनों तक ना तो मैंने फ़ोन किया ना ही मेरे पति ने। मेरी रातों की नींद हराम हो गयी। सारी सारी रात भर मैं कमरे में बत्ती जला कर बैठी रहती और अपनी किस्मत को कोसती रहती थी।

फिर मैंने तय किया की ऐसे तो जिंदगी जी नहीं जाती। मेर पिता जी ने मुझे बड़ी हिम्मतवान बनने की ट्रेनिंग दी थी। मैंने अपना मन पक्का किया और मेरे पति के लौटने के बाद पहली ही रात को मैंने उन्हें आड़े हाथोँ लिया।

मैंने उन्हें धड़ल्ले से पूछा की “राज, सच सच बताना, तुम किसको चोद रहे थे?”

पहले तो मेरे पति इधर उधर की बातें बनाते रहे, पर जब मैंने उनसे यह कहा की, “देखो, पानी अब सर से ऊपर जा रहा है। मैं भली भाँती जानती हूँ की उस रात तुम कोई औरत को जरूर चोद रहे थे। वह मैंने उस औरत के मुंह से साफ़ साफ़ सूना था। अब छुपाने से कोई लाभ नहीं। मैं तुमसे इस लिए इतनी नानीरज नहीं हूँ की तुम उस औरत को चोद रहे थे…

मैं जानती हूँ की तुमसे चूत को चोदे बगैर ज्यादा दिन रहा नहीं जा सकता। मैं इसलिए ज्यादा नानीरज हूँ की तुम यह बात मुझसे छुपाते रहे। अगर तुम मुझसे नहीं छुपाते और अपना गुनाह कुबूल कर लेते तो मैं तुम्हें माफ़ भी कर देती। अब साफ़ साफ़ बता दो वरना मैं इसी वक्त यह घर छोड़ कर जा रही हूँ। मैं तुम्हें तलाक का नोटिस मेरे वकील के द्वारा भिजवा दूंगी। अगर तुमने अभी मान लिया की तुम कोई औरत को चोद रहे थे, तो मैं तुम्हें माफ़ भी कर सकती हूँ।”

नीरज ने जब यह सूना तो उसकी सिट्टीपिट्टी गुम हो गयी। उसकी आँखें नम हो गयी। वह थोड़ी देर चुप रहा और फिर मेरा हाथ पकड़ कर बोला, “दीक्षा डार्लिंग, देखो तुमने वचन दिया है की तुम मुझे माफ़ कर दोगी तो मैं बताता हूँ की मैं उस समय अपनी सेक्रेटरी के साथ था।”

मैंने पूछा, “साफ़ साफ क्यों नहीं कहते की तुम अपनी सेक्रेटरी को चोद रहे थे?” तब मेरे पति ने अपनी मुंडी हिलाकर हामी भरी।

मेरे पति की बात सुनकर मैं तिलमिला उठी। मुझे बड़ा ही करारा सदमा लगा। मैं भी मेरे पति के बगैर अकेली महसूस कर रही थी। मेरी चूत भी सारी रात चुदाई के बिना बेचैन हो कर मचलती रहती थी।

मैंने कहा, “कमाल है! तुम चूत के बिना नहीं रह सकते? और मेरा क्या? मैं यहां तुम्हारे बिना कैसे इतने दिन गुजार रही हूँ? कभी सोचा तुमने?”

तब मेरे पति ने मेरी और सहमे हुए देखा और उसके मन की बात उसके मुंह से निकल ही पड़ी।

वह बोला, “मुझे क्या पता तुम भी किसी से चुदवा नहीं रही हो? मैं जानता हूँ की तुम भी तो लौड़े के बिना रह नहीं सकती? मैं जानता हूँ की तुम्हारा एक मर्द के साथ चक्कर चल रहा है। तुम रोज उसके साथ जाती हो। सच है के नहीं? बोलो?”

मेरे पति ने अपनी कमजोरी छिपाने के लिए मुझपर इतना बड़ा इल्जाम सहज में ही लगा दिया, यह बात सुनकर मेरे पाँव के निचे से ज़मीन खिसक गयी।

मैं कितनी मुश्किल से अपनी रातें गुजार रही थी। और मेरे पति ने एक ही झटके में मुझे एक पत्नी से राँड़ बना दिया! जो काम करने के बारे में मैंने सोचा भी नहीं था, उसका दोषारोपण बिना जाने मेरे पति ने मेरे सर पर कितनी आसानी से मँढ़ दिया? वाह! यह दुनिया!! कमाल यह सब सम्बन्ध!!! अरे! आखिर शादी भी तो एक पवित्र बंधन है! कोई भला कैसे इसे इतने हलके से ले सकता है?

मैंने कहा, “हाँ रोज उसके साथ जाती हूँ। पर तुमने यह कैसे सोच लिया की मेरा उस के साथ चक्कर चल रहा है? क्या हर बार कोई औरत कोई मर्द के साथ जाए तो यह मान लेना चाहिए की उनका चक्कर चल रहा है? फिर तो तुम्हारा तो सैंकड़ो औरतों के साथ चक्कर चल रहा होगा? तुम्हारा दफ्तर तो लड़कियों से भरा पड़ा है।”

मैं कहनी वाली थी की जब तुमने कह ही दिया है तो अब तो मैं जरूर चक्कर चलाऊंगी। पर मैं चुप रही। मैंने तय किया की मैं जरूर चक्कर चलाऊंगी और फिर अपने पति को माकूल जवाब दूंगी की ना सिर्फ मेरा चक्कर चल रहा था पर मैं उससे चुदवा भी रही थी।

मरे पति की उस बात ने मेरी जिंदगी पलट कर रख दी। उस रात तक मैं व्याह के पवित्र वचनों में पूरा विश्वास रखती थी। मैं मानती थी की पर पुरुष से चोरी छुपकर सेक्स करना एक पाप है और उससे भी कहीं ज्यादा वह पति पत्नी के अटूट पर नाजुक बंधन पर गहरा घाव करता है।

कोई बंधन अटूट तब तक रहता है जब तक उस पर अविश्वास का घाव ना लगे। मेरे पति ने किसी औरत को चोदा, यह मेरे लिए इतना कटु नहीं था जितना उनका झूठ बोलना।

वह किसी औरत के साथ रंगरेलियाँ मनाये उसको भी मैं बर्दाश्त कर लेती, उन्होंने मुझसे झूठ बोला उसको भी मैं झेल लेती, पर उससे भी ज्यादा तो यह था की उन्होंने मुझ पर इल्जाम लगाया की मैं भी उनकी तरह किसी और मर्द से चुदवा रही थी। वह तो हद ही हो गयी।

यदि उन्होंने ने मुझे पहले से कहा होता की “डार्लिंग मुझसे चुदाई किये बिना रहा नहीं जाता और मैं एक औरत को चोदना चाहता हूँ; तो मैं शायद थोड़ा ना नुक्कड़ कर मान भी जाती। पर पकडे जाने के बाद बहाने बाजी करना, झूठ बोलकर उसे छिपाने की कोशिश करना और फिर अपनी पतिव्रता पत्नी पर ही इल्जाम लगाना यह मेरे लिए असह्य बन रहा था। मैं उस रात समझ गयी की व्याह के समय दिए गए वचन, कस्मे और वादे सिर्फ शब्द ही थे जिन्हें ज्यादा गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं थी।

पर हाँ साथ साथ मुझे तब एक राहत भी महसूस हुई। मुझे भी तो चुदाई की जरुरत थी। कई रातों अकेले में मैं कोई कड़क लण्ड की जगह एक केले को लेकर उसे अपनी चूत में डालकर उसे रगड़ कर आनंद लेने की कोशिश करते परेशान हो गयी थी।

मुझे मेरे पति पर तरस भी आया। वह बेचारे एक रात भी मेरे बगैर नहीं रह सकने वाले इतनी सारी रातें किसी को चोदे बिना कैसे रह सकते थे?

मैं समझ गयी की मेरे पति मुझ पर शक कर एक खुली शादी की और इशारा कर रहे थे। एक ऐसी शादी जिसमें पति अथवा पत्नी एक साथ शादी के बंधन में रहते हुए भी, जब भी उन्हें किसी को चोदने का या फिर किसी से चुदवाने का कोई मौक़ा मिले और अगर उन्हें ऐसा करना मन करे तो वह कोई बंधन में बंधे बिना उनको चोद सकते हैं या फिर उनसे चुदवा सकते हैं।

अगर वह ऐसा सोचते थे तो मुझे भी उसमें कोई बुराई नहीं लगी; क्यूंकि आखिर कोई भी वीर्यवान पुरुष और कामातुर स्त्री चुदाई के बगैर कितने दिन रह सकते हैं?

उस दिन के बाद जब मेरे पति कुछ दिनों के लिए फिर टूर पर जाने के लिये निकले तो मेरी सम्भोग की कामना को मैं दमन कर नहीं पायी।

अब मैं अपनी चूत की भूख मिटाने के लिए कुछ आज़ाद महसूस कर रही थी। मुझे सबसे पहले मनीष की याद आयी। वह गाँव तो जरूर पहुंचा होगा और अपनी बीबी की अच्छी तरह चुदाई कर रहा होगा।

मैंने सोचा क्यों ना मैं उससे थोड़ा मजाक करूँ? मैंने उसे मैसेज किया, “ठीक हो? सब कुछ ठीक तो चल रहा है? दर्द का इलाज तो हो गया होगा। दर्द कुछ कम हुआ की नहीं?” ऐसा करना मेरे लिए शायद सही नहीं था। ऐसा करने से मैंने अनजाने में ही मनीष को अपने मन की गहराई में झाँकने का मौक़ा दे दिया।

मेरे पास उसका फ़ौरन मैसेज आया, “मैं वापस आ गया हूँ। दर्द वही का वहीँ है। पर तुम स्त्रियां हम पुरुषों का फ़ायदा क्यों उठाती हैं? क्या तुम लोग हमें बेवकूफ समझती हो?”

मेरा दिमाग चकरा गया। मुझे मैसेज में कुछ गड़बड़ी लगी। मनीष के व्यक्तित्व में कुछ कर्कशता तो थी पर ऐसे शब्द तो उन्होंने कभी नहीं कहे। क्या मतलब था इस मैसेज का?

शायद जैसा की अक्सर होता है, जरूर कोई बटन की दबाने में गलती हो गयी। मैंने मैसेज लिया, “मैं समझी नहीं। खुलकर बताओ।”

मनीष ने मैसेज किया, “मेरा मानस ठीक नहीं है। मेरे शब्दों का बुरा मत मानना। मिलकर बात करेंगे। बात कुछ सीरियस है। अगर आपके पास समय हो तो शाम को कहीं मिलकर बात करेंगे।”

इसका मतलब यह था की मैं मनीष से सुबह मिल नहीं सकती थी। मेरा मन किया की मैं मनीष को दिन में ही कहीं मिलूं। पर मुझे ऑफिस में जरुरी काम था।

शाम को कहाँ मिलूं? तो मैंने सोचा क्यों ना उसे घर बुला लूँ? वह अकेला है। बाहर का खाना खाता है। आज मैं उसे घर का खाना ही खिला दूंगी। तो बात भी आराम से हो जायेगी। पर मुझे उसे घर बुलाना ठीक नहीं लगा। हालांकि मैं मनीष से आकर्षित तो थी, पर फिर भी मुझे उस पर शत प्रतिशत भरोसा अब भी नहीं था।

मुझे डर था की यदि मैंने उसे घर बुलाया तो कहीं वह उसका गलत मतलब ना निकाले। कहीं उसे मेरी उससे चुदवाने की इच्छा समझ कर उसका फ़ायदा ना उठा ले। मेरा हाल भी ठीक नहीं था।

उन दिनों मैं चुदवाने के लिए बेताब हो रही थी। घर में हम दोनों अकेले होने के कारण कहीं वह मुझे मेरे ही घर में चोद ना डाले। अगर ऐसा कुछ हुआ तो मुझे डर था की मैं उसे रोक नहीं पाउंगी।

मैं सच में इस उधेड़बुन में थी की अगर ऐसा मौक़ा आये की मनीष मुझे चोदने पर आमादा हो जाए तो क्या मुझे उससे चुदवाना चाहिए या नहीं? जब तक मेरा मन मनीष से चुदवाने के लिए राजी न हो जाए तब तक मुझे उसे घर बुलाना ठीक नहीं लगा।

मनीष ने मैसेज किया, “ठीक है शाम को मिलेंगे। कहाँ और कितने बजे?”

मैंने जवाब दिया, “मेरे घर के सामने रेस्टोरेंट है, वहीँ मिलेंगे। जब तुम काम से फारिग हो जाओ तो फ़ोन कर लेना और आ जाना। हम शाम का खाना वहीँ खा लेंगे।”

उसके मैसेज की कर्कश भाषा मैं समझ नहीं पा रही थी। मैने ऐसा क्या किया की मनीष का मेरे प्रति इतना कडुआहट भरा रवैया हो गया? कहीं उस दिन ट्रैन में जो मैंने मनीष के लण्ड को मुठ मारी थी उसके बारेमें तो मनीष यह नहीं कह रहा था?

क्या वह मुझसे नानीरज था या वह मुझ पर अपना गुस्सा निकाल रहा था? उस ट्रैन में हुए वाकये के बारेमें वह क्या सोच रहा होगा? क्या मैं उसके मन की बात जान पाउंगी? क्या वह मेरे मन की इच्छा जान गया था? क्या वह उसे पूरी करेगा?

मैं मेरे मन में खड़े हुए इन सारे सवालों से परेशान थी। दिन में ऑफिस में मेरा मन नहीं लगा। मैं शाम का बेसब्री से इंतजार करने लगी।

उम्मीद है आपको मेरी कहानी पसन्द आयी होगी। अपने सुझाव, शिकायते, प्यार मुझे मेल करते रहें।

KyaKhabar32@gmail.com

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