Dost Ki Sauteli Maa- Part 2-दोस्त की सौतेली माँ-2

By | December 5, 2018
Dost Ki Sauteli Maa- Part 2

Dost Ki Sauteli Maa- Part 2

मेरी सेक्स कहानी के प्रथम भाग
दोस्त की सौतेली माँ-1
में आपने पढ़ा कि मेरे एक दोस्त की माँ की मौत के बाद उसके पिता ने अपने से काफी कम उम्र की कुंवारी लड़की से शादी कर ली. मैंने जब उसे देखा तो मेरा दिल उसकी जवानी को भागने के लिए मचलने लगा.

“दीक्षा जी … आपको देखकर और आपकी बातें सुनकर मेरा भी दिल नहीं कर रहा जाने का … पर मेरे रुकने से आपकी बदनामी या आपके जीवन में कोई परेशानी ना हो इसीलिए मुझे जाना होगा.”
“तो रुक जाइए ना … मैं भी अकेले सोते सोते परेशान हो चुकी हूँ … आज आपके साथ जागने से शायद मेरी रात का अकेलापन भी दूर हो जाये …” दीक्षा की तरफ से खुला न्यौता मिल चुका था तो अब भला मैं चुत का रसिया कैसे आपने आप को रोकता।

मैंने बिना देर किये दीक्षा को अपनी बाँहों में ले लिया और उसके चेहरे को ऊपर कर अपने होंठ दीक्षा के होंठों से मिला दिए। दीक्षा के होंठ कांप रहे थे, दीक्षा के हाथ भी मेरी कमर से लिपट गए।
“बेडरूम कहाँ है …” मैंने पूछा तो दीक्षा ने हाथ के इशारे से बताया।

अब आगे:

मैंने दीक्षा को गोदी में उठाया और बेडरूम की तरफ ले चला। दीक्षा का बदन फूल सा हल्का था। आज एक कोमल कली का रसपान करने का मौका हाथ लगा था तो मैं पूरा मजा उठाने के मूड में आ गया था।
कमरे में जाते ही मैंने दीक्षा को बेड पर बैठाया और दरवाजा बंद कर दीक्षा से लिपट गया। कुछ देर दोनों एक दूसरे के होंठों का रसपान करते रहे फिर दोनों ही एक दूसरे के कपड़े कम करने में व्यस्त हो गए। कुछ पल बाद ही हम दोनों कमरे में बिल्कुल नंगे थे और दीक्षा मेरी गोद में बैठी हुई थी। उसकी चुचियाँ तन चुकी थी। मेरे हाथ उसकी चुचियों और जांघों पर घुमने लगे थे। छोटी छोटी झांटों के बीच छोटी सी चुत … आज सच में बहुत मजा आने वाला था।

कुछ देर मैंने दीक्षा की चुचियों को मसला और दीक्षा के हाथ भी अब मेरे लंड को सहला रहे थे। मैंने दीक्षा को बेड पर लेटाया और उसकी तन कर खड़ी चुचियों को मुँह में लेकर चूसने लगा। दीक्षा की सिसकारियां कमरे में गूंजने लगी थी। उसके हाथ अब भी मेरे लंड पर ही थे। अपने कोमल कोमल हाथों से वो मेरे आठ इंच लम्बे और तीन इंच मोटे लंड को मस्ती में सहला और मसल रही थी।

मैं अब उसकी चुचियों को छोड़ नीचे की तरफ बढ़ने लगा और और उसके पेट और नाभि को चुमते हुए मेरे होंठ उसकी झांटों से होते हुए उसकी चुत पर जाकर रुके और मैंने जीभ निकाल कर उसकी चुत चाटना शुरू किया तो दीक्षा मचल उठी और मेरे सर को अपनी चुत पर दबाने लगी।
उसकी चुत पानी पानी हो रही थी। जवान चुत का स्वादिष्ट नमकीन पानी मेरी जीभ से होते हुए मुँह में घुलने लगा। पाँच मिनट की चुत चटाई में ही दीक्षा उत्तेजित होकर अकड़ने लगी और फिर बिना देर किये उसकी चुत ने ढेर सारा कामरस मेरे मुँह पर छोड़ दिया।

झड़ने के बाद दीक्षा थोड़ा सुस्त हुई तो मैंने उठ कर अपने लंड का सुपारा उसके होंठों से लगा दिया।
एक क्षण के लिए दीक्षा ने मेरे लंड को देखा और बोली- राज जी … आपका ये तो बहुत बड़ा और मोटा है!
लंड ने टुनक कर तारीफ के लिए शुक्रिया बोला।

दीक्षा पहले तो जीभ निकाल कर सुपारा चाटती रही, फिर धीरे से उसे अपने होंठों में दबा लिया। लंड दीक्षा के मुँह के हिसाब से भी थोड़ा मोटा था और मुँह में लेने के लिए दीक्षा को पूरा मुँह खोलना पड़ा। मुँह में लेने के बाद दीक्षा जितना अन्दर ले सकती थी उतना ही लंड चूसने लगी। लंड पर दीक्षा के कोमल होंठों के अहसास से मेरे बदन में भी झुरझरी सी होने लगी और मुँह से ‘आह …’ फूट पड़ी।
सच में बहुत मजा आ रहा था। लंड को दीक्षा के मुंह में दिए दिए ही मैं दीक्षा पर झुक कर उसकी चुत को चाटने लगा और फिर ये सिलसिला थोड़ी देर और चला।

कुछ देर बाद दीक्षा ने लंड को मुंह से निकाला और बोली- राज जी … अब और नही चूस सकती … नीचे आग लगी हुई है जल्दी से मेरी आग बुझा दो … बहुत प्यासी हूँ मैं!
मैं तो पहले से ही तैयार था, मैंने पास पड़ी एक क्रीम उठाकर अपने लंड और दीक्षा की चुत पर लगाई और अपने लंड को दीक्षा की चुत की सैर करवाने के लिए तैयार हो गया।
“जो हुक्म मेरी रानी …” कहकर मैंने दीक्षा को बेड पर सीधा लेटाया और एक तकिया उसकी गांड के नीचे रख चुत को ऊपर की तरफ उभार अपना लंड का सुपारा उसकी चुत के दरवाजे पर टिका दिया।

चुत भट्टी की तरफ सुलग रही थी। चुत का दरवाजा इतना छोटा सा था कि लग ही नहीं रहा था कि इस चुत ने पहले कभी लंड लिया होगा। मैंने लंड पकड़ कर दीक्षा की चुत पर रगड़ना शुरू किया तो वो चहक उठी और अपनी गांड उठा उठा कर लंड को अन्दर लेने के लिए तड़पने लगी।

मैं भी अब ज्यादा देर करने के मूड में नहीं था। मैंने लंड से चुत पर दबाव बनाना शुरू किया तो अहसास हुआ कि दीक्षा की चुत कुँवारी लड़की की तरह बहुत टाइट थी। सावधानी जरूरी थी, नहीं तो चुत के फटने के पूरे चांस थे।
मैंने धीरे धीरे लंड चुत में सरकाना शुरू किया। लंड का सुपारा चुत को फैलाता हुआ अन्दर घुसने लगा और जैसे जैसे चुत फैलती गई दीक्षा को दर्द का अहसास होने लगा। वो अपने हाथ नीचे लेकर लंड को चुत से हटाना चाहती थी पर चुत के रसिया ने आज तक कमसिन से कमसिन लड़की को भी अपने लंड के नीचे आने के बाद बिना चुदाई के नीचे से निकलने नहीं दिया था।

मैंने एक लम्बी सांस ली और बिना दीक्षा को मौका दिए एक जोरदार धक्का लगा दिया। दीक्षा दर्द के मारे बिलबिला उठी, उसकी कमसिन सी चुत से खून टपकने लगा। शायद चुत किनारे से फट गई थी।
दीक्षा मेरे नीचे से निकलने के लिए छटपटाई पर मैंने दीक्षा को कस कर पकड़े रखा और एक और धक्का लगा कर कम से कम चार इंच लंड उसकी चुत में उतार दिया।

“राज … छोड़ … दो … राज … मैं मर जाऊँगी … बहुत दर्द हो रहा है राज …” दीक्षा की आँखों से आँसू टपकने लगे थे और वो जोर जोर से रोने लगी थी।
जितना लंड अन्दर घुसा था मैं उतना ही लंड डाले हुए रुक गया और दीक्षा की चूची को मुंह में लेकर चूसने चाटने लगा- दीक्षा … तुम्हारी चुत बहुत मस्त है मेरी जान …
राज … उम्म्ह… अहह… हय… याह… दर्द हो रहा है … प्लीज एक बार निकाल लो …”
“बस मेरी रानी ये पहली बार का दर्द है … इसके बाद मजा ही मजा आने वाला है … बस थोड़ा सा और बर्दाश्त कर लो!”

मैंने थोड़ी देर उसके होंठ और चूची को चुसा तो दीक्षा भी थोड़ा आराम महसूस करने लगी पर अभी तो आधा लंड बाहर था। मैंने जितना लंड अन्दर था उसी को धीरे धीरे अन्दर बाहर करना शुरू कर दिया। हर बार लंड थोड़ा जोर लगा कर अंदर की तरफ सरका देता। दीक्षा भी हर धक्के के साथ एक दर्द भरी आह भरती। पंद्रह बीस धक्के लगाने के बाद भी सिर्फ आधा इंच ही लंड और अन्दर जा पाया था। सच में बहुत टाइट चुत थी दीक्षा की।

मैंने महसूस किया कि अगर मैं ऐसे ही करता रहा तो कहीं पूरी चुदाई से पहले ही मेरा काम तमाम ना हो जाए। मन पक्का किया और अपने होंठ दीक्षा के होंठों पर लगा कर मैंने दो तीन जबरदस्त धक्के लगा कर पूरा लंड चुत में उतार दिया। दीक्षा दर्द के मारे सिहर उठी पर नाजुक सी दीक्षा मेरे हट्टे कट्टे बदन के नीचे दबी होने के कारण हिल भी नहीं पा रही थी। पूरा लंड डालने के बाद मैं रुका। दीक्षा की आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह रही थी।

मेरा लंड किसी संकरी दरार में फंसा हुआ महसूस हो रहा था। ऐसा लग रहा था किसी शिकंजे में जकड़ा हुआ हो लंड। मैं पाँच मिनट ऐसे ही लेटा रहा।
मेरे रुक जाने से दीक्षा का दर्द भी कुछ कम हुआ।
“राज … तुम बहुत गंदे हो … कोई इतना दर्द भी देता है किसी को …” दीक्षा रोते रोते ही बोली।
“मेरी जान … जिस दर्द के कारण अब मैं तुम्हें गन्दा लग रहा हूँ थोड़ी देर बाद उसी दर्द के लिए शुक्रिया बोलोगी … बस थोड़ा सहन करो और सब्र रखो … असली मजा तो अभी आना बाकी है।”
“तब तक चाहे मेरी जान ही क्यों ना निकल जाए …”
“चिंता ना करो … तुम बिल्कुल सही बन्दे के साथ हो … मरने तो क्या तुम्हें अब कोई दुःख नहीं होने देगा ये राज … विश्वास करो!”

ऐसे ही दीक्षा को बातों में लगा कर मैंने उसका थोड़ा ध्यान बदला और धीरे धीरे लंड को भी अन्दर बाहर करने लगा। अभी लंड चुत में बहुत कसा कसा जा रहा था। मैं भी खुल कर अच्छे से चुदाई नहीं कर पा रहा था। क्रीम की चिकनाई से भी काम नहीं बन रहा था। मैंने लंड बाहर निकाला तो देखा मेरा लंड खून से लाल हो गया था और दीक्षा की चुत किनारों से फट गई थी। मैंने देशी तरीका अपनाते हुए ढेर सारा थूक दीक्षा की चुत पर डाल कर दुबारा से लंड का सुपारा टिका दिया दीक्षा की चुत पर।

इस बार दो धक्को में ही पूरा लंड दीक्षा की चुत के अन्दर था। दीक्षा कसमसाई पर अब मैं रुका नहीं और धीरे धीरे धक्कों की शुरुआत की और फिर स्पीड बढ़ती चली गई। ज्यों ज्यों धक्कों की स्पीड बढ़ रही थी, वैसे वैसे दीक्षा को भी अब दर्द के साथ साथ मजा आने लगा था।

पाँच मिनट की चुदाई के बाद जब लंड थोड़ा आराम से चुत में अन्दर बाहर होने लगा तो दीक्षा ने भी अपनी गांड उठा उठा कर लंड का अपनी चुत में स्वागत करना शुरू कर दिया- आह्ह … …आह्ह्ह्ह … आह्ह … राज अब अच्छा लग रहा है … उईई माँ … अब मजा आ रहा है … ऐसे ही करते रहो मेरे राजा … ओह्ह्ह … उम्मम्म … आह्ह्ह … चोदो … उम्म्म … चोदो … जोर से चोदो …” दीक्षा अब मस्ती में बड़बड़ा रही थी।

कसी हुई चुत को चोद कर मेरा लंड भी निहाल हो रहा था। तीस बत्तीस की दीक्षा की चुत किसी पंद्रह सोलह साल की कमसिन लड़की की चुत का अहसास करवा रही थी। तभी तो मैं भी खुद को जन्नत में महसूस कर रहा था। मेरी भी सिसकारियां आहें निकल जाती थी बीच बीच में।

दीक्षा की दोनों चुचियों को अपनी मुट्ठी में कसकर पकड़े हुए मैं सधे हुए धक्के लगा रहा था. उधर दीक्षा अपनी गांड उठा कर मेरे हर धक्के का जवाब देते हुए ताल से ताल मिला रही थी। कमरे में थप थप की मधुर आवाज गूंज रही थी।

थोड़ी ही देर में जब दीक्षा की चुत ने पानी छोड़ा तो थप थप के साथ फच्च फच्च की आवाजों का मिश्रण शुरू हो गया। दीक्षा की चुत में लंड ने अब अपनी जगह बना ली थी और पानी निकलने से दीक्षा की चुत भी अब चिकनी हो गई थी जिस कारण अब चुदाई का असली मजा आने लगा था हम दोनों को।

दस मिनट की चुदाई के बाद दीक्षा जोरदार ढंग से झड़ गई। पर मेरा अभी नहीं हुआ था तो मैं धक्के लगाता रहा।

एक मिनट सुस्त होने के बाद दीक्षा फिर से रंग में आ गई। मैंने दीक्षा को पलटी मारते हुए अपने ऊपर ले लिया। पहले तो दीक्षा के समझ में नहीं आया कि उसे क्या करना है पर जब मैंने उसको ऊपर नीचे होने को कहा तो वो अपनी चुत को मेरे लंड पर मारते हुए ऊपर नीचे होकर चुदने लगी।
पोज बदलने से उसको थोड़ा दर्द हुआ पर फिर भी वो लगी रही। क्यूंकि दर्द पर मस्ती भारी थी।

कुछ देर ऐसे ही चुदाई चली फिर मैंने उसको घोड़ी बना लंड पीछे से उसकी चुत में डाल कर चुदाई शुरू की तो दीक्षा मस्ती भरी सिसकारियां भरते हुए चुदने लगी। कुछ मिनट बाद ही मुझे लगा कि अब मेरा होने को है तो मैंने चुदाई थोड़ी तेज कर दी।
मेरी तेज चुदाई से दीक्षा भी झड़ने के लिए मचल उठी- चोद मेरे राजा … फाड़ दे … चोद जोर से चोद … चोद अपनी प्यासी दीक्षा को …
चुदते हुए दीक्षा मस्त हो गई थी।

फिर अचानक दीक्षा का बदन अकड़ने लगा जो इस बात का सूचक था कि अब दीक्षा झड़ने को है। उधर मेरा लंड भी लावा उगलने को तैयार था। कुछ ही धक्के और लगे थे कि पहले दीक्षा और साथ ही मैं भी जोरदार ढंग से झड़ने लगे। दीक्षा की चुत से निकला रस मुझे मेरे लंड पर निकलता महसूस हो रहा था और दूसरी तरफ मेरा लंड गर्म गर्म वीर्य दीक्षा की चुत में भरता जा रहा था।

झड़ने के बाद मैंने दीक्षा को अपने ऊपर ले लिया और दीक्षा ऐसे ही लंड को अपनी चुत में लिए लिए ही मेरे सीने पर सर रख कर सो गई। दीक्षा थक गई थी और सच कहूँ तो इतनी कसी हुई कड़क चुत चोद कर मुझे भी थकावट हो रही थी। दीक्षा के फूल सा बदन को बाँहों में लिए लिए ही मुझे भी नीद सी आने लगी थी।

लगभग आधा घंटा हम दोनों ऐसे ही पड़े रहे। जब थोड़ा रिलेक्स हुए तो दीक्षा उठी। उसके उठते ही मेरा लंड पट की आवाज के साथ उसकी चुत से निकला और साथ ही निकला ढेर सारा वीर्य और दीक्षा के कामरस का मिश्रण जिसमें दीक्षा की चुत के उद्घाटन की लाली भी मिली हुई थी।

दीक्षा उठ कर कमरे के साथ में बने बाथरूम में चली गई। मैं बेड पर पड़ा उसका इंतजार कर रहा था।

कुछ देर बाद दीक्षा अपनी चुत अच्छे से साफ करके वापिस आई और अपने साथ लाये गीले तौलिये से उसने मेरा लंड भी अच्छे से साफ किया। दीक्षा का हाथ लगते ही लंड फिर से औकात में आने लगा और दुबारा से तन कर खड़ा हो गया। लंड को खड़े होते देख दीक्षा मुस्कुरा दी।
“बड़ा शैतान है आपका ये … देखो तो अभी अभी मेहनत करके हटा है और अब फिर से खड़ा होने लगा … बहुत जालिम है ये … दर्द भी देता है और मजा भी … मेरी तो सूज गई इसकी मार से” दीक्षा ने अपनी सूज कर डबल रोटी हुई चुत दिखाते हुए कहा।
“जानेमन … इसका कसूर नहीं है … तुम जैसी खूबसूरत लड़की के हाथ का असर है … जब तक ये तुम्हारे हाथ में है ये थकने वाला नहीं …”
“अच्छा जी …” कहकर दीक्षा लंड पर झुक गई और अपने होंठों में सुपारे को दबा चूसने लगी।

दीक्षा के कोमल होंठों के स्पर्श से लंड फिर से अकड़ कर लोहे की रॉड सा कड़ा हो गया। मेरे हाथ भी दीक्षा के नंगे बदन पर घुमने लगे। कभी दीक्षा की गोल गोल चुचियों को मसलने लगते तो कभी दीक्षा की जाँघों को। दीक्षा उठ कर मेरे पास लेट गई और अपने हाथ से अपनी एक चूची मेरे मुँह में दे दी। मैं भी जीभ घुमा घुमा कर दीक्षा की चूची चूसने और चाटने लगा। दीक्षा की सिसकारियां एक बार फिर कमरे में गूंजने लगी।

कुछ देर चूमा-चाटी का दौर चला और फिर दीक्षा लंड लेने के लिए मचलने लगी तो मैंने भी बिना देर किये धीरे धीरे पूरा लंड दीक्षा की चुत में उतार दिया और एक बार फिर से लम्बी चुदाई का दौर चला। अलग अलग आसन में मैंने लगभग आधा घंटा दीक्षा की चुदाई की। दीक्षा तीन बार झड़ी इस बार।

चुदाई के बाद हम दोनों सो गए। सुबह जब आँख खुली तो दीक्षा मेरे पास नहीं थी। घड़ी देखी तो नौ बज रहे थे। घड़ी देखते ही मुझे होश आया और याद आया रात का नजारा। मैं बेचैन हो गया कि बाहर कैसे जाया जाए क्योंकि बाहर गुलशन बैठा होगा।

अभी सोच विचार कर ही रहा था कि दीक्षा चाय का कप लेकर कमरे में आई।
“यार बहुत देर हो गई … तुमने मुझे समय से क्यों नहीं उठाया … अब मैं बाहर कैसे जाऊँगा?”
“तो ना जाइये ना … आज यहीं रुक जाइये”
“पागल हो क्या … बाहर वो बुड्ढा गुलशन बैठा होगा.”
“उनकी चिंता आप ना करें … वो तो कब के उठ कर ठेके पर दारू पीने चले गए.”
“अरे तो वो वापिस भी तो आएगा … और फिर अडोस पड़ोस भी तो है … और मुझे ऑफिस भी तो जाना होगा ना …”

दीक्षा मुझे रोक कर दिन में चुदाई का आनंद लेना चाहती थी पर मुझे ऑफिस जाना था। दिल्ली में होने वाली मीटिंग बाबत कभी भी फ़ोन आ सकता था। अरुण को कुछ बताना भी पड़ सकता था। दीक्षा मुझे जाने नहीं देना चाहती थी तो मैंने भी उसकी तड़प देखते हुए एक राउंड और चुदाई का मारने का मन बना लिया और फिर कमरे में एक बार फिर से घपाघप शुरू हो गई।

दस बजे तक चुदाई के मजे लेने के बाद मैंने दीक्षा को शाम को दुबारा आने का वादा किया और जल्दी से अपने कमरे पर पहुँचा। तैयार हो ऑफिस गया और फिर सारा दिन काम में व्यस्त रहा।
उधर दीक्षा रात की चुदाई के बाद मेरी दीवानी हो गई थी। दिन में उसने कम से कम बीस बार मुझे फ़ोन किया और आई लव यु बोला।

शाम को ऑफिस का काम आठ बजे तक ख़त्म हुआ। मैं ऑफिस से निकल पहले अपने कमरे पर गया। दीक्षा का फ़ोन बार बार आ रहा था कि उसने मेरे लिए खाना बनाया हुआ है और मैं जल्दी से उसके घर आ जाऊं पर फिर भी दीक्षा के घर जाने में मुझे साढ़े नौ बज गए। आज मैं गाड़ी की जगह बाइक लेकर गया था। दीक्षा मुझे दरवाजे पर ही खड़ी मिली और घर के अंदर आते ही वो मुझ से लिपट गई।

गुलशन आज भी उसी सोफे पर नशे में धुत पड़ा था। मैं दीक्षा को गोदी में उठा कर सीधा उसके बेडरूम में ले गया। आज बिस्तर बड़े अच्छे से सजाया हुआ था। कुछ फूल भी बिखरे हुए थे। दीक्षा चुदाई के मजा लेने के लिए एकदम तैयार थी।

थोड़ी देर चूमा-चाटी का दौर चला और फिर वो मेरे लिए खाना लेने रसोई में चली गई। दीक्षा ने बहुत बढ़िया खाना बनाया हुआ था जिसे हम दोनों ने एक साथ बैठ कर खाया। खाना खाने के बाद दीक्षा बर्तन लेकर रसोई में चली गई और तब तक मैं उसका इंतज़ार करते हुए अपने लंड को सहला कर खड़ा करने लगा ताकि आते ही सीधा दीक्षा की चुत में उतार दूँ।

कुछ देर बाद दीक्षा दूध का गिलास लेकर आई और हम दोनों ने एक ही गिलास में सिप करके पिया।

उसके तुरंत बाद कपड़े उतार हम दोनों चुदाई में व्यस्त हो गए। पहले दौर की चुदाई बीस मिनट से ज्यादा चली। चुदाई के बाद हम दोनों थक कर लेट गए। दीक्षा मेरे कंधे पर सर रख कर लेटी हुई थी।
“दीक्षा … कल तुमने पहली बार लंड का मजा लिया था ना … जबकि तुम्हारी शादी को छ: महीने होने को आये … गुलशन ने अभी तक कुछ नहीं किया तुम्हारे साथ?”
“वो नामर्द भला क्या कर सकता है … शराब ने उसका जिस्म खोखला कर दिया है … सुहागरात पर उसने कोशिश तो बहुत की पर मेरी चुत चोदने लायक दम नहीं है उसके लंड में … वैसे तो लंड लम्बा भी है और मोटा भी पर चुत पर लगते ही झड़ जाता है साला!”

मैं चुपचाप पड़ा सुन रहा था और दीक्षा बोलती रही- जानते हो राज … बहुत तड़पी हूँ मैं … क्यूंकि ये कमीना तो मेरे अन्दर आग लगा कर सो जाता था और मैं सारी सारी रात जलती रहती थी इस आग में … मेरे माँ बाप ने ऐसे संस्कार नहीं दिए है मुझे कि मैं कहीं बाहर मुँह मारती … सच कहूँ पर तुम अरुण को मत कह देना … कभी कभी जब आग कुछ ज्यादा भड़क जाती थी तो मेरा मन होता था कि मैं जाकर अरुण से ही चुदवा लूँ … पर लोकलाज के मारे कि कैसे मैं अपने बेटे से चुदवा सकती हूँ रोक लेती थी अपने आप को … और फिर अरुण भी तो मुझसे बात तक नहीं करता … कल भी तुम्हारे आने से पहले बूढ़े ने मेरी आग भड़का दी थी और फिर तुम्हें देख कर मैं अपने आप को रोक नहीं पाई … और मैंने अपना कौमार्य तुम्हारे सुपुर्द कर दिया.

दीक्षा की बात सुन बूढ़े पर गुस्सा आ रहा था। पर मुझे क्या … मुझे तो चुत से मतलब था और वो भी इतनी मस्त करारी चुत …

उसके बाद तो तीन दिन दिल खोल कर चुदाई का खेल चला। दीक्षा मुझसे चुद कर बहुत खुश थी। अरुण के आने के बाद भी बहुत बार दीक्षा मुझे दिन में फ़ोन करके बुला लेती और मैं भी ऑफिस की जिम्मेदारी अरुण को दे उसके घर पहुँच जाता उसकी सौतेली माँ की चुदाई करने।

जब तक मेरी पोस्टिंग भोपाल रही ये चुदाई का सिलसिला चलता रहा। उसके बाद तो कभी भोपाल गए तो मुलाक़ात हुई और मौका मिला तो चुदाई भी हुई. पर अब दीक्षा खुश है क्यूंकि अरुण से उसकी दोस्ती हो गई है … कौन सी दोस्ती हुई ये मुझे नहीं पता पर अब वो खुश है.

दोस्तों आपको मेरी चुदाई की कहानी कैसी लगी मुझे मेल करके बताये और सुझाव भी दे ! अगर आप अपनी कहानी Submit करना चाहते है तो मेल कर सकते है-Kyakhabar32@gmail.co

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