Dost Ki Sauteli Maa- Part 1-दोस्त की सौतेली माँ-1

By | December 5, 2018
Dost Ki Sauteli Maa- Part 1

Dost Ki Sauteli Maa- Part 1

  दोस्त की सौतेली माँ-2

सभी दोस्तों को ढेर सारा प्यार … खासतौर पर लड़कियों को दोहरा प्यार … दोहरा मतलब मेरा भी और मेरे पप्पू (लंड) का भी।
एक बात तो है इंसान को बड़ा नहीं होना चाहिए। बड़ा होते ही जिम्मेदारी शुरू और फिर मस्ती कम होती चली जाती है। आपका दोस्त राज फिर भी अपने बिजी समय में से कुछ समय निकाल कर आ ही जाता है अपनी एक सेक्सी सी दास्तान लेकर।

आज की कहानी मेरे दोस्त की सौतेली माँ और आपके राज की कहानी है।
अरुण नाम था उसका, भोपाल का रहने वाला था, उम्र उसकी कोई बाईस या तेईस साल, मेरी ही कंपनी में मेरा जूनियर था वो। थोड़े ही दिन में वो मेरा बढ़िया दोस्त बन गया था। उसी ने मुझे भोपाल में रहने के लिए कमरा दिलवाया। मेरे हर काम में मेरी मदद करने के लिए तैयार रहता था वो।

एक दिन शाम को पेग लगाने का मन हुआ तो मैंने अरुण को बुला लिया। इससे पहले हम कम से कम दारू पीने के लिए तो कभी साथ नहीं बैठे थे। मुझे तो ये भी नहीं पता था कि अरुण पीता भी है या नहीं।

अरुण आया तो बड़ा परेशान सा नजर आ रहा था। मैंने वजह पूछी तो पहले तो वो टाल गया पर फिर अचानक रोने लगा तो मुझे बड़ा अजीब सा लगा। मैंने एक पेग बना कर उसको दिया तो वो बिना पानी डाले ही गटक गया और जोर जोर से खाँसने लगा।
मामला कुछ संगीन लग रहा था।

मैंने अरुण को किसी तरह शांत किया और उसको वजह बताने को कहा तो उसने बताना शुरू किया:

अरुण की माँ चार साल पहले मर चुकी थी। बाप ने इसी गम में शराब पीनी शुरू कर दी थी। घर में सिर्फ बाप बेटा ही थे पर शराब के चक्कर में अरुण का बाप गुलशन अक्सर घर नहीं आता था। अरुण इन्तजार करके खा पी के सो जाता। कभी कभी तो यह भी होता कि तीन-तीन चार-चार दिन गुलशन का कोई अता-पता नहीं होता था।

फिर एक दिन अरुण के ताऊ और चाचा घर पर आये तो अरुण ने सब हाल सुना दिया।
ताऊ और चाचा ने गुलशन को समझाया और अरुण की शादी कर देने की सलाह दी। अरुण वैसे तो उम्र में अभी छोटा था पर पहाड़ी लोग कम उम्र में भी शादी कर देते हैं। अपनी शादी की बात सुन अरुण के मन में लड्डू फूटा।

पर गुलशन के दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था। एक हफ्ते बाद ही गुलशन एक तीस बत्तीस साल की लड़की के साथ घर आया और अरुण को बोला- बेटा, आज से ये तुम्हारी नई माँ है।

कहाँ तो अरुण अपनी शादी के सपने बुन रहा था पर उसके बाप ने उसके सपनो तो तोड़ा सो तोड़ा … उल्टा खुद शादी करके अरुण पर वज्रपात कर दिया था।
टूट सा गया था अरुण … अपने बाप से नफरत सी हो गई थी उसको।

इस बात को लगभग छ: महीने होने को आये थे पर वो अपने बाप की करतूत को भूल नहीं पा रहा था।

मैंने अरुण को समझाया कि जो हो गया उसको भूल जाओ और अपने भविष्य का सोचो और अपने काम में दिल लगाने की कोशिश करो।
दो पेग और लगाने के बाद उस दिन अरुण मेरे कमरे पर ही सो गया।

अगले चार पाँच दिन अरुण अपने घर नहीं गया और हर रात मेरे कमरे पर ही आ जाता। मुझे अरुण के लिए बहुत बुरा लग रहा था कि उसके बाप ने सच में उसके साथ ज्यादती की है। छठे दिन मैंने अरुण को घर जाने के लिए समझाया पर वो जाने के लिए तैयार नहीं हो रहा था तो मैंने कहा- चलो मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ और तुम्हारे बाप से बात करता हूँ।

मेरे कहने से वो तैयार हो गया। असल में मैं भी चाहता था कि अरुण अपने घर चला जाए क्योंकि उसके मेरे साथ रहने से मेरी प्राइवेसी खत्म होती जा रही थी। उसके होते ना तो मैं कहीं जा पा रहा था और ना ही खुल कर रहने का आनन्द ले पा रहा था।

शाम को करीब सात बजे मेरी गाड़ी से अरुण और मैं उसके घर पहुँचे। दरवाजा अरुण की नई माँ दीक्षा ने खोला। बेशक वो तीस बतीस साल की होगी पर एकदम पतली सी कमसिन सी बीस साल की लड़की लग रही थी। कद भी पाँच फीट से कम ही था उसका। मैं तो हैरान हो गया की इस लड़की के माँ बाप ने कैसे एक 48 साल के आदमी से अपनी लड़की ब्याह दी।

अरुण गुस्से में अन्दर चला गया। मैं कुछ देर तो दरवाजे पर खड़ा सोचता रहा कि अरुण मुझे बिना अन्दर बुलाये ही चला गया। मैं जैसे ही वापिस जाने के लिए मुड़ा तो दीक्षा (अरुण की सौतेली माँ) की मधुर सी आवाज कानों में पड़ी- प्लीज अन्दर आ जाईये … चाय पी कर जाना!

मन तो अरुण के व्यव्हार से थोड़ा खराब हो गया था पर ना जाने क्यों … फिर भी दीक्षा को ना नहीं कर पाया और उसके साथ अन्दर चला गया।
अरुण अपने कमरे में जा चुका था, मैं ड्राइंग रूम में बैठा इधर उधर देख रहा था, ड्राइंग रूम से रसोई सामने ही नजर आ रही थी, रसोई में दीक्षा चाय बना रही थी।

जब कुछ और नजर नहीं आया तो मेरी नजर दीक्षा पर चिपक गई। चिपकती भी क्यों ना … मैं ठहरा चूत का रसिया।

मन में घूमने लगा कि गुलशन किस्मत का कितना धनी है जो ऐसा मस्त माल मिला है उसको और वो भी इस उम्र में। तब तक दीक्षा चाय लेकर आ गई। मैंने उसके चेहरे पर नजर डाली। दीक्षा खूबबसूरत तो थी पर ना जाने क्यों उसका चेहरा कुछ मुरझाया हुआ सा लगा।

वो चाय देकर जाने लगी तो मैंने उसको भी बैठने के लिए कहा तो वो चुपचाप मेरे सामने वाले सोफे पर बैठ गई। कहते है ना कमीने लोगों की नजर में ही एक्सरे होता है। मेरी नजर दीक्षा के अंग अंग पर घूम गई।
दीक्षा पतली सी थी। चुचियाँ शरीर के हिसाब से मस्त थी। पतली कमर, कूल्हे थोड़े उठे हुए थे गोल गोल।

“क्या बात आप कुछ परेशान सी लग रही हैं?” मैंने बातचीत चालू करने के मकसद से पूछा।
“नहीं … ऐसी कोई बात नहीं है … बस …”
“बस …” दीक्षा के बात अधूरा छोड़ने पर मैंने उससे पूछा।
“बस अरुण को लेकर थोड़ा परेशान रहती हूँ … वो ना तो मुझसे बात करता है और ना ही मुझे पसंद करता है। मुझे ये सब बुरा लगता है।”
“आप परेशान ना हों … मैं समझाऊंगा अरुण को …”
“आप सोचिये … इसके अलावा अब मेरा है ही कौन … इसके पापा का तो आपको पता ही है …”

मुझे समझते देर नहीं लगी कि दीक्षा की अपने पति को पसंद नहीं करती और अरुण उससे नफरत करता है तो वो परेशान है। पहली मुलाक़ात थी तो मैंने ज्यादा बात करना ठीक नहीं समझा और चाय पी कर दुबारा आने और अरुण को समझाने की कह कर वापिस कमरे पर आ गया।

उस रात बार बार दीक्षा का ख्याल आता रहा। वैसे भी भोपाल आये बहुत दिन हो गए थे और कोई परमानेंट चुत का जुगाड़ नहीं हुआ था। कमीने दिमाग में घूम गया कि क्यों न दीक्षा को ही पटा कर चोदा जाए। बस ख्याल आया तो रात को सपनों में दीक्षा की जम कर चुदाई की।

अगले दिन से ही सोचने लगा कि कैसे दीक्षा की चुत का मजा लिया जाए। वो तो अरुण हरदम मेरे साथ या आसपास रहता था तो प्लान पर काम करने का मौका नहीं मिल रहा था।

एक हफ्ते बाद कंपनी की मीटिंग थी दिल्ली में। उसमें भोपाल ब्रांच से भी किसी एक को जाना था। सीनियर होने के नाते मुझे ही जाना था पर मैंने गेम खेली और बहाना बना कर अपनी जगह अरुण का नाम मीटिंग के लिए भेज दिया। अरुण को भी समझा दिया कि तीन दिन की मीटिंग है तो दिल्ली जा आओ। मीटिंग भी अटेंड कर लेना और तीन दिन घूमना फिरना भी हो जाएगा तो मन बहल जाएगा।
अरुण मान गया।

मीटिंग बारे सब कुछ समझा कर मैंने एक दिन पहले ही रात को अरुण को भेजने का प्रबंध कर दिया। उस रात करीब दस बजे मैं अरुण को लेने के लिए उसके घर गया तो उस दिन भी दरवाजा दीक्षा ने ही खोला। अन्दर गया तो देखा गुलशन सोफे पर ही नशे में धुत लुढ़का हुआ था। दीक्षा ने बताया- ये तो इनका हर रोज का काम है।

दीक्षा ने अरुण को आवाज दी तो अरुण अपना बैग लेकर आ गया और बिना दीक्षा से बात किये बाहर आकर गाड़ी में बैठ गया।
“दीक्षा जी, अरुण तीन चार दिन बाद आएगा अगर आपको किसी चीज की जरूरत हो तो मुझे याद कर लीजियेगा.” मैंने अपना विजिटिंग कार्ड उसको देते हुए कहा।
वो कुछ नहीं बोली बस कार्ड को ले लिया।

रात को करीब ग्यारह बजे अरुण को दिल्ली की वॉल्वो में बैठा कर मैं वापिस अपने कमरे की तरफ चल पड़ा। पर अचानक पता नहीं दिमाग में क्या सूझी मैंने गाड़ी अरुण के घर की तरफ मोड़ दी। अरुण के घर पहुँच कर मैंने जैसे ही बेल बजाई, करीब दो मिनट बाद दीक्षा ने आकर दरवाजा खोला।

वो अपने कपड़े बदल चुकी थी और अब एक ढीली सी मेक्सी पहने हुए थे। मुझे दरवाजे पर देख वो हैरान हुई। मैं गाड़ी में बैठा बैठा ही सोच चुका था कि क्या कहना है और क्या करना है।
“दीक्षा जी … वो अरुण शायद अपनी फाइल भूल गया है … आप उसके कमरे में देख कर बता दीजिये।” मैंने दीक्षा को कहा।
गुलशन अब भी सोफे पर ही था बस उसके ऊपर अब कम्बल आ गया था जो दीक्षा ने ही उसके ऊपर डाला होगा।

दीक्षा मुझे वहीं छोड़ अरुण के कमरे में गई और कुछ देर बाद ही वापिस आ गई और बोली- उसके कमरे में तो कोई फाइल नहीं है।
“ओह्ह … फिर शायद अरुण को भूल लग गई होगी … हो सकता है वो फाइल उसके बैग में ही हो.”
“जी!” दीक्षा ने इससे ज्यादा कुछ नहीं कहा।

मैंने चलने को कहा तो और जैसे ही दरवाजे की तरफ चला तो दीक्षा की मीठी सी आवाज कानों में पड़ी- प्लीज आप थक गए होंगे … चाय पी कर जाइये.
मैंने एक बार दीक्षा की तरफ देखा और एक बार गुलशन की तरफ। शायद वो मेरी मनोभावना समझ गई थी।
“ये अब सुबह से पहले नहीं उठने वाले!”
“ये हर रोज पीते है क्या …”
“जी … हर रोज नहीं, हर समय नशे में ही रहते हैं …”

“एक बात पूछ सकता हूँ … अगर बुरा ना मानें तो?”
“पूछिये … बुरा क्यों मानूँगी!”
“फिर भी … आपकी पर्सनल लाइफ से सम्बंधित प्रश्न है तो!”
“बेझिझक पूछिये!”
“आप इतनी खूबसूरत हैं … जवान हैं … फिर आपने इस बूढ़े से शादी क्यों कर ली?”
“बस … किस्मत का खेल ही कह सकते हैं.”
“फिर भी अगर आप बताना पसंद करें तो मैं जानना चाहूँगा?”

“मेरे पिता जी की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी … तो उन्होंने इनसे कुछ कर्जा ले लिया था. दूसरे मांगलिक होने के कारण मेरी शादी नहीं हो पाई थी, उम्र भी तीस से ज्यादा हो गई थी तो अब रिश्ता होने के चान्स भी कम ही रह गये थे. बस उसी का फायदा उठा इन्होंने मेरे बाप से मेरा हाथ मांग लिया. वो लाचार बेचारा क्या करता … बाँध दिया मुझे इस खूंटे से!” कहते कहते दीक्षा की आँखों से आँसू टपक पड़े।

“ओह्ह … बहुत बुरा हुआ … आपके खुद के भी सपने होंगे … उनका क्या?”
“गरीब के भी कभी सपने होते हैं भला …” कह कर दीक्षा सुबकने लगी।

मैं उसके चुप करवाने के इरादे से उसके पास गया और उसके आँसू पौंछते हुए उसको चुप होने के लिए बोला।
दीक्षा उठ कर रसोई में चली गई। दो मिनट बाद वो अपना मुँह धोकर वापिस आई और मुझ से पूछा- आप चाय लेंगे या कॉफ़ी बना दूँ?
“कुछ भी बना लीजिये … जिसमे आप मेरा साथ दे सकें।”

दीक्षा कॉफ़ी बनाने लगी। कॉफ़ी बन कर आई और हम दोनों ने साथ में बैठ कर पी। कॉफ़ी पीने के बाद मैं उठा और अपने कमरे पर जाने के लिए खड़ा हुआ तो दीक्षा की प्यास उसकी जुबान पर आ ही गई- रात बहुत हो गई है … अगर आप यही रुक जाएँ तो!
“रुक तो जाऊं पर कोई हक़ से रोके तो …”
“मतलब?”
“मतलब ये …”
“बोलिए ना?”

“दीक्षा जी … आपको देखकर और आपकी बातें सुनकर मेरा भी दिल नहीं कर रहा जाने का … पर मेरे रुकने से आपकी बदनामी या आपके जीवन में कोई परेशानी ना हो इसीलिए मुझे जाना होगा.”
“तो रुक जाइए ना … मैं भी अकेले सोते सोते परेशान हो चुकी हूँ … आज आपके साथ जागने से शायद मेरी रात का अकेलापन भी दूर हो जाये …” दीक्षा की तरफ से खुला न्यौता मिल चुका था तो अब भला मैं चुत का रसिया कैसे आपने आप को रोकता।

मैंने बिना देर किये दीक्षा को अपनी बाँहों में ले लिया और उसके चेहरे को ऊपर कर अपने होंठ दीक्षा के होंठों से मिला दिए। दीक्षा के होंठ कांप रहे थे, दीक्षा के हाथ भी मेरी कमर से लिपट गए।
“बेडरूम कहाँ है …” मैंने पूछा तो दीक्षा ने हाथ के इशारे से बताया।

दोस्तों आपको मेरी चुदाई की कहानी कैसी लगी मुझे मेल करके बताये और सुझाव भी दे ! अगर आप अपनी कहानी Submit करना चाहते है तो मेल कर सकते है-Kyakhabar32@gmail.co

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